भाजपा से पूनम ढिल्लों तो कांग्रेस से पूनम शर्मा होगी उम्मीदवार!

आप से हरमोहन धवन की पक्की! 
 
राज सिंह 
 
चंडीगढ़ 11 जनवरी 2019। राजनीतिक गलियारे से बेहद सनसनीखेज सूचना मिल रही है कि भाजपा चंडीगढ़ लोकसभा सीट से पूर्व फ़िल्म अभिनेत्री पूनम ढिल्लों चुनाव लड़ सकती है। यह स्थिति तब से पैदा हुई है, जब से पार्टी के बड़े नेता सत्यपाल जैन ने इशारों ही इशारो में अपनी दावेदारी ठोक दी है। दूसरी तरफ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष संजय टंडन ने भी चुनाव लड़ने के लिए अपनी जबरदस्त तैयारी कर ली है। फ़िलहाल सूचना है कि पूर्व क्रिकेटर कपिल देव ने राजनीति में आने से मना कर दिया है। 
 
इस प्रकार से खेर, जैन और टंडन के बीच टिकट को लेकर दावेदारी होती रही तो पूनम ढिल्लों का वर्ष 2014 की तरह ही इस बार शहर से चुनाव लड़ना तय माना जा रहा है। बताना जरूरी है कि वर्ष 2014 लोकसभा चुनाव में टिकट को लेकर हरमोहन धवन, सत्यपाल जैन और संजय टंडन के आपसी घमासान और स्थानीय गुटबाजी के कारण ही पैराशूट से किरण खेर टिकट लेकर शहर की धरती पर उतर आई थी। इस प्रकार से वर्ष 2014 एक बार फिर से वर्ष 2019 लोकसभा चुनाव में दोहराया जा सकता है। यहां बताना जरूरी है कि किरण खेर भी सांसद और नेता के रूप में शहर में फेल हो चुकी है।
 
राजनीति के माहिर मानते हैं कि कांग्रेस में भी टिकट के लिए आपसी घमासान मचा हुआ है। एक ओर जहां पवन बंसल और मनीष तिवारी टिकट की दावेदारी जता रहे हैं, तो वहीं कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री व पूर्व मेयर पूनम शर्मा भी टिकट पाने के लिए दिल्ली का लगातार चक्कर काट रही हैं। शायद इसकी भनक कुछ ही लोगों को है।
 
ध्यान रहे कि पवन बंसल चार बार चंडीगढ़ से सांसद और दो बार मंत्री रह चुके हैं, इसके बावजूद बंसल के लिए राह आसान नहीं है। 2009 में बंसल को 1 लाख 61 हजार वोट मिले थे जो 2014 में वोटों की संख्या घटकर 1 लाख 21 हजार रह गयी थी, यानी 40 हजार वोट कम पड़े। इसका नतीजा यह हुआ था कि पिछले लोकसभा चुनाव 2014 में बंसल 70 हजार के रिकॉर्ड मार्जिन से चुनाव बुरी तरह से हार गए थे। 
 
राजनीतिक पंडित इसके कई कारण बता रहे हैं। एक तो बंसल पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बड़ी नाराजगी थी, क्योंकि बंसल ने कभी भी पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को नेता या कार्यकर्ता समझा ही नहीं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब वर्ष 2009 में धवन की ताकत और उनके समर्थन से बंसल चुनाव जीते थे। इसके बाद बंसल ने कभी भी धवन का धन्यवाद करना भी उचित नहीं समझा था। उनकी इसी कार्यशैली से धवन ने कांग्रेस छोड़ दी थी। वहीं रामपाल शर्मा, सुभाष चावला, डीडी जिंदल, पवन शर्मा, रविंदर पाली और वर्तमान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप छाबड़ा जैसे कई बड़े नेताओं को दिल्ली तो दूर जीरकपुर से भी आगे बढ़ने नहीं दिया गया। कहने का मतलब यह है कि बंसल ने अपने इन कट्टर समर्थकों को पार्षद से आगे की बात सोचने तक नहीं दिया। इस प्रकार से कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता के साथ ही शहर की जनता आज भी बंसल की रही कार्यशैली को लेकर अंदर ही अंदर सुलग रहे हैं। इससे भी बढ़कर बंसल पर रेल गेट पर लगे गम्भीर आरोप को भी कोई नहीं भूले हैं।
 
वहीं लोक सभा चुनाव 2014 में आम आदमी पार्टी की गुल पनाग पहली बार चुनाव लड़ी थीं और 1 लाख 8 हजार वोट लेकर आईं थी, जो कांग्रेस से सिर्फ 13 हजार वोट ही कम थे। इस प्रकार से भाजपा और कांग्रेस में टिकट पाने के लिए राजनीतिक गलाकाट घमासान छिड़ा हुआ है। वही दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी से पूर्व केंद्रीय मंत्री हरमोहन धवन की उम्मीदवारी लगभग पक्की मानी जा रही है।
 
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2019 लोकसभा चुनाव भाजपा की किरण खेर के लिये कठिन ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। यह इसलिए कि 2014 के चुनाव में किरण खेर को मिलने वाली सफलता के लिए मोदी लहर औऱ हरमोहन धवन व उनके समर्थकों का भरपूर सहयोग माना जाता है। आज के समय में न तो मोदी लहर है और न ही धवन उनके साथ है, बल्कि इसके ठीक विपरीत किरण खेर ने जो जनता के साथ वायदे किये थे, उनमें से एक भी वायदा पूरा नहीं हुआ। इसका खामियाजा किरण खेर को भुगतना ही पड़ सकता है।  
 
अब रही मनीष तिवारी की बात तो कांग्रेस से टिकट के दावेदार मनीष तिवारी जो दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हैं और जिनका चंडीगढ़ की राजनीति से कोई सरोकार नहीं रहा है, ऐसे में उन्हें उम्मीदवार के रूप में शहर की जनता क्या स्वीकार करेगी। दूसरी तरफ चार बार सांसद और दो बार मंत्री रहने वाले बंसल ने पिछले साढ़े चार साल में कोई ऐसा करिश्मा नहीं किया कि जिससे कांग्रेस के गिर चुके जनाधार में कोई सुधार हुआ हो। वहीं आम आदमी पर्टी की बात करें तो हरमोहन धवन आने वाले समय में अपने किये हुए कामों के आधार पर भाजपा और कांग्रेस को जबरदस्त चुनौती दे सकते हैं।